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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । क्या भारत में अवैध तरीके से रह रहे लोगों को सिर्फ आधार कार्ड के दम पर वोट डालने का अधिकार मिल जाएगा? सुप्रीम कोर्ट ने SIR केस में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से यही तीखा सवाल पूछा है। कोर्ट ने साफ किया कि आधार कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं है यह सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए एक पहचान पत्र है। कोर्ट की चिंता यह है कि कहीं यह कार्ड वोटर लिस्ट में धांधली का जरिया न बन जाए, जिससे देश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे। क्या आधार कार्ड 'गैर-नागरिकों' को भी वोटिंग का हक देगा?
देश की सर्वोच्च अदालत में इन दिनों SIR Systematic Intensive Revision को चुनौती देने वाले मामलों पर गहन सुनवाई चल रही है। इसी दौरान एक ऐसा मुद्दा उठा जिसने सीधे तौर पर देश की नागरिकता और चुनावी प्रक्रिया की नींव को हिला दिया। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने आधार कार्ड के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आधार कार्ड को लेकर यह बहस तब तेज़ हुई जब यह सामने आया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी यह दस्तावेज़ हासिल कर रहे हैं जो कानूनी रूप से भारतीय नागरिक नहीं हैं- आसान भाषा में कहें तो 'घुसपैठिए' या अवैध प्रवासी।
कोर्ट का सीधा सवाल "अगर किसी व्यक्ति को राशन या अन्य सरकारी लाभ लेने के लिए आधार कार्ड दिया जाता है, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर उसे वोटर बना दिया जाएगा? मान लीजिए कोई पड़ोसी देश का नागरिक है और वह यहां मजदूरी करता है, तो क्या उसे वोट का अधिकार मिलेगा?" यह सवाल बताता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की गंभीरता को समझता है।
यह कोई साधारण मामला नहीं है यह देश की संप्रभुता और लोकतांत्रिक पहचान से जुड़ा है। आधार कार्ड पहचान पत्र, नागरिकता प्रमाण नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को बार-बार स्पष्ट किया है कि आधार एक्ट स्वयं यह कहता है कि यह दस्तावेज़ नागरिकता या अधिवास Domicile साबित नहीं करता है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक विकास परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं के लाभ को हर व्यक्ति तक पहुंचाना है।
आधार कार्ड की सीमाएं: कोर्ट के अनुसार, आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं यह भारत का नागरिक होने का सबूत नहीं है। वोटिंग अधिकार नहीं देता आधार कार्ड के बल पर वोट डालने का अधिकार नहीं मिलता। सिर्फ सरकारी लाभों के लिए इसका उपयोग मुख्य रूप से सब्सिडी, राशन या अन्य सरकारी सेवाएं प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
यह समझना ज़रूरी है कि एक सरकारी दस्तावेज़ के तौर पर आधार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे नागरिकता प्रमाण पत्र मान लेना एक बड़ी कानूनी और संवैधानिक भूल होगी। यही वजह है कि कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड का इस्तेमाल केवल वोटर लिस्ट में छूटे हुए नामों को नोटिस देने के लिए एक दस्तावेज़ के रूप में हो सकता है, नागरिकता साबित करने के लिए नहीं।
वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी
इस पूरी बहस में भारत निर्वाचन आयोग Election Commission of India - ECI की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग को फॉर्म-6 वोटर बनने का आवेदन में जमा किए गए दस्तावेजों की सही होने की पुष्टि करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा "इलेक्शन कमीशन कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है। उसे वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने से पहले सभी दस्तावेजों की सटीकता को वेरिफाई करना होगा।"
इसका मतलब साफ है कि ECI केवल कागजात देखकर नाम नहीं जोड़ सकता उसे हर आवेदन की गहराई से जांच करनी होगी। अगर कोई व्यक्ति आधार कार्ड दिखाता भी है, तो भी आयोग को उसकी नागरिकता से जुड़े अन्य दस्तावेज़ों और सबूतों की जांच करनी चाहिए।
SIR प्रोसेस पर क्यों हो रहा है बवाल?
SIR यानी Systematic Intensive Revision वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है। इसी प्रक्रिया को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनौती दी गई है। सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में SIR प्रक्रिया पर बड़ी चिंताएं जताईं हैं। कपिल सिब्बल की मुख्य चिंताएं आम आदमी पर बेवजह दबाव SIR प्रोसेस में वोटरों पर बेवजह फॉर्म भरने का दबाव डाला जा रहा है।
अनपढ़ वोटरों की समस्या: कपिल सिब्बल ने कहा कि कई वोटर अनपढ़ हैं और वे जटिल फॉर्म नहीं भर सकते। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उनका नाम लिस्ट से हटा दिया जाएगा।
निष्पक्ष प्रक्रिया की मांग: नाम हटाने की प्रक्रिया निष्पक्ष और सही होनी चाहिए, न कि मनमानी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जयमाल्या बागची ने इस बात पर जोर दिया कि वोटर लिस्ट से मरे हुए वोटरों के नाम हटाना बेहद ज़रूरी है ताकि चुनाव की शुचिता बनी रहे। यहां संतुलन बनाना ज़रूरी है- लिस्ट की सफाई हो, लेकिन किसी सच्चे नागरिक का नाम गलती से न हटे।
कोर्ट ने मांगा जवाब: इस बेहद संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब चुनाव आयोग को 1 दिसंबर तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता भी अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।
यह सुनवाई निर्धारित करती है कि भविष्य में आधार कार्ड का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया में किस हद तक होगा और यह भी कि घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से बाहर रखने के लिए क्या कड़े कदम उठाए जाएंगे।
देश की राजनीति और नागरिकता के दृष्टिकोण से यह फैसला मील का पत्थर साबित हो सकता है। सभी की निगाहें अब 1 दिसंबर के बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।
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