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क्या 2027 से पहले खत्म होगा संविधान? क्या है अखिलेश यादव का डर?

अखिलेश यादव ने 'वोट काटने' वाली SIR प्रक्रिया को 'महा-षड्यंत्र' बताया है, जिसके तहत 2027 से पहले खेत, ज़मीन, आरक्षण और राशन छीनने की साजिश रची जा रही है। जानें, SIR क्या है और यह खतरा कितना सच है?

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Ajit Kumar Pandey
AKHILESH YADAV UPDATE

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने देश के 12 राज्यों में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण SIR प्रक्रिया को 'लोकतंत्र के साथ धोखाधड़ी' बताया है, जिसके बाद भारतीय राजनीति में हलचल पैदा हो गई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि आज यदि वोट काटे जा रहे हैं, तो कल को खेत, ज़मीन, मकान, राशन और आरक्षण से भी लोगों के नाम काट दिए जाएंगे।

यह सीधा आरोप देश में साल 2027 के संभावित बड़े संवैधानिक बदलाव की तरफ इशारा कर रहा है, जिसे अखिलेश ने 'अंग्रेजों की गुलामी से भी खराब स्थिति' बताया है। Young Bharat News की इस Explainer यह जानेंगे कि आखिर SIR क्या है और अखिलेश यादव की 'महा-षड्यंत्र' की थ्योरी क्या है? क्या वाकई में SIR सिर्फ वोट काटना या संवैधानिक 'महा-षड्यंत्र' है? 

देश के राजनीतिक गलियारों में इस वक्त एक ही चर्चा गर्म है SIR Special Intensive Review। यह प्रक्रिया देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है, जिसके तहत मतदाता सूचियों को अपडेट और पुनरीक्षित किया जा रहा है। आमतौर पर यह एक रूटीन प्रक्रिया होती है, लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने इसे लेकर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उसने इस पूरी कवायद को शक के घेरे में ला दिया है। 

अखिलेश यादव ने अपनी 'X' पोस्ट और सार्वजनिक बयानों में खुलकर कहा है कि यह सिर्फ वोट काटने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देशवासियों के खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश है। सवाल यह है कि एक सामान्य मतदाता सूची समीक्षा पर इतना बड़ा राजनीतिक हमला क्यों? इसके पीछे की क्या जटिल राजनीति और संभावित सामाजिक-आर्थिक खतरे छिपे हैं? 

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सच ये है कि अखिलेश यादव का सबसे बड़ा डर वोट से ज़मीन-राशन तक 'कटौती' का चक्रव्यूह है। अखिलेश यादव की चेतावनी एक छोटे दायरे तक सीमित नहीं है। उन्होंने इस तथाकथित 'साजिश' को एक क्रम में समझाया है, जो किसी भी आम नागरिक को डराने के लिए काफी है। 

पहला चरण: आज आपका वोट काटा जा रहा है। 

दूसरा चरण: कल को आपके खेत, ज़मीन और मकान से आपका नाम हटाया जाएगा। 

तीसरा चरण: इसके बाद राशन, जाति और आरक्षण जैसी मौलिक सुविधाओं और पहचानों पर हमला होगा। 

अंतिम चरण: बात मध्यवर्ग के बैंक खातों और लॉकर तक पहुंच जाएगी। 

अखिलेश यादव ने साफ तौर पर कहा कि यह स्थिति 'अंग्रेजों की गुलामी से भी खराब' होगी। "ये देशवासियों के खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश है, जो अंग्रेजों की गुलामी से भी खराब स्थिति में ले जाएगी। ये समय जागने का है और एक-एक वोट बचाने का है।" 

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इस बयान के न केवल गहरे मायने हैं बल्कि इसमें उनका दर्द भी छिपा है। यह सिर्फ चुनाव आयोग पर सवाल नहीं है, बल्कि देश की संवैधानिक गारंटी और नागरिकता की मौलिक परिभाषा पर सीधा हमला है। 

बीएलओ BLO पर 'अमानवीय' दबाव: सरकारी तंत्र पर आरोप 

अखिलेश यादव ने इस पूरी प्रक्रिया में शामिल ग्राउंड लेवल के सरकारी कर्मचारियों, यानी बूथ लेवल ऑफिसर्स BLO पर भी हो रहे अमानवीय व्यवहार का मुद्दा उठाया है। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार अपने 'चुनावी महाघोटाले' के लिए बीएलओ को SIR का अव्यावहारिक लक्ष्य unrealistic target दे रही है। 

अमानवीय व्यवहार: बीएलओ को असंभव लक्ष्य देकर मशीन की तरह काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिससे उन पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। 

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नौकरी का डर: अखिलेश यादव का कहना है कि सरकार नई नौकरियां तो दे नहीं रही, उलटा जो चली आ रही हैं, उन्हें भी इतना कठिन बना दिया है कि लोग हताश होकर नौकरी छोड़ दें। 

यह आरोप सरकारी तंत्र के भीतर से ही दबाव बनाने की रणनीति की तरफ इशारा करता है, जहां कर्मचारियों को नैतिकता और नौकरी बचाने के बीच किसी एक को चुनना पड़ रहा है। 

2027 के पहले 'संविधान वाला शिगूफा' क्यों उठ रहे हैं ये सवाल? 

अखिलेश यादव के इस आक्रामक तेवर को 2027 के पहले संवैधानिक बदलाव की आशंकाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'खेत, ज़मीन, आरक्षण' छीनने जैसे संवेदनशील बयान यूं ही नहीं दिए जाते। 

दरअसल, साल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही, सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं द्वारा 'संविधान बदलने' की बात खुलकर कही गई है। भले ही शीर्ष नेतृत्व ने इसका खंडन किया हो, लेकिन इस तरह की बयानबाजी ने विपक्ष को एकजुट होने और जनता के बीच डर पैदा करने का मौका दे दिया है। 

अखिलेश यादव की रणनीति साफ है संविधान पर खतरा! 

सपा मुखिया अखिलेश यादव के मुताबिक, जनता को यह समझाना कि उनका सबसे बड़ा हथियार वोट और उनकी पहचान आरक्षण, ज़मीन खतरे में है। 

पहचान की राजनीति: दलित, पिछड़े और गरीब वर्ग को यह एहसास दिलाना कि SIR जैसी प्रक्रियाएं उनकी सामाजिक-आर्थिक पहचान को खत्म करने की दिशा में पहला कदम हैं। 

डर बनाम जागरूकता: डर को इस तरह से पेश करना कि वह निष्क्रियता के बजाय सक्रिय जागरूकता और विरोध में बदल जाए। 

SIR WITH AKHILESH YADAV

अखिलेश की 'महागठबंधन' अपील, NDA के सहयोगियों को भी चेतावनी 

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अखिलेश यादव ने सिर्फ विपक्षी दलों को ही नहीं, बल्कि NDA राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दलों को भी इस 'महा-षड्यंत्र' के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है। उनका तर्क है कि जो दल आज भाजपा को अपना सहयोगी मान रहे हैं, सबसे पहले भाजपा उन्हीं का खात्मा करेगी। 

यह अपील एक राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक की तरह है, जिसका उद्देश्य NDA के भीतर के असंतुष्ट धड़ों को भी अपने साथ जोड़ना है। अखिलेश यादव की सीधी अपील विपक्षी दल एकजुट होकर भाजपा के इस महा-षड्यंत्र का पर्दाफाश करें। NDA सहयोगी यह समझें कि भाजपा सबसे पहले उन्हीं की राजनीति को खत्म करेगी उन्हें अपने अस्तित्व के लिए लड़ना होगा। देशवासी सारे काम छोड़कर SIR की घपलेबाजी को रोकें और वोट के रूप में अपनी पहचान को बचाएं। 

यह अपील न सिर्फ एक मजबूत राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि सपा इस मुद्दे को सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहती है। 

क्या है SIR? चुनाव आयोग की दलील और कानूनी पक्ष 

विशेष गहन पुनरीक्षण SIR प्रक्रिया के तहत, चुनाव आयोग घर-घर जाकर यह सुनिश्चित करता है कि मतदाता सूची में कोई 'फर्जी' या 'डुप्लीकेट' नाम न हो और कोई भी योग्य नागरिक छूट न जाए। 

उद्देश्य: सूची को त्रुटिहीन Error-free बनाना। 

प्रक्रिया: बीएलओ द्वारा भौतिक सत्यापन, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना। 

विवाद की जड़: विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग, विपक्षी दलों के समर्थकों के वोट काटने के लिए किया जा रहा है। 

हालांकि, चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल लगातार कह रहे हैं कि यह एक पारदर्शी और आवश्यक प्रक्रिया है। लेकिन, अखिलेश यादव जैसे बड़े नेता के आरोपों के बाद, इस प्रक्रिया पर अब न केवल राजनीतिक बल्कि न्यायिक और सामाजिक नजर भी टिक गई है। 

अखिलेश यादव की नई रणनीति महज राजनीतिक बयानबाजी नहीं है। यह पहचान की राजनीति और संवैधानिक सुरक्षा को एक साथ जोड़कर जनता के बीच एक मजबूत नैरेटिव बनाने की कोशिश है। 

खतरे की घंटी निर्वाचन में पक्षपात: यदि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर और पक्षपातपूर्ण ढंग से नाम काटे जाते हैं, तो यह सीधे चुनाव परिणामों को प्रभावित करेगा। 

सामाजिक अस्थिरता: 'ज़मीन और आरक्षण छीनने' की बात सीधे तौर पर देश के एक बड़े, वंचित वर्ग में गहरे डर और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। 

लोकतांत्रिक साख: चुनाव आयोग जैसी संस्था की साख पर लगा यह धब्बा अंततः देश की लोकतांत्रिक नींव को कमजोर कर सकता है। 

यह ज़रूरी है कि जनता इस SIR प्रक्रिया पर केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में नहीं, बल्कि अपने मौलिक अधिकारों और देश के भविष्य से जुड़े एक गंभीर मुद्दे के रूप में विचार करे। 

आज वोट बचाना सिर्फ एक चुनाव जीतना नहीं है, यह संविधान की आत्मा को बचाना है। 

इस पूरी पड़ताल में विपक्षी दल या महागठबंधन अभी तक यह साबित नहीं कर पाए कि भारतीय चुनाव आयोग पक्षतापूर्ण कार्य कर रहा है। उनका तमाम तरीके का आरोप महज एक चुनावी स्टंट साबित होकर रह गया है।

इसका उदाहरण बिहार में SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब चुनाव संपन्न हुआ और परिणाम आए तो कांग्रेस पार्टी के ही एक कद्दावर नेता शकील अहमद ने कांग्रेस पार्टी को ही कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि 65 लाख लोगों का वोट कटा है बिहार में लेकिन, चुनाव खत्म होने तक उनमें से 35 लोग भी शिकायत लेकर नहीं आए तो इसको क्या कहेंगे। 

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