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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी की समीक्षा बैठक में जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, यह पहली बार है जब असंतुष्ट नेताओं ने हार का ठीकरा सीधे 'हाईकमान' की रणनीतियों और फैसलों पर फोड़ा है। यह बैठक सिर्फ हार की समीक्षा नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर एक बड़े उबाल का संकेत है- क्या आलाकमान अब भी जमीनी हकीकत से दूर है?
बिहार में कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अपने न्यूनतम वोट शेयर पर आ सिमटी है। जिस महागठबंधन के भरोसे पार्टी ने 'अच्छे दिनों' की उम्मीद लगाई थी, वही उसके लिए 'आत्मघाती' साबित हो रहा है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों की हार को लेकर बुलाई गई समीक्षा बैठक को देखकर लग रहा था कि यह मंथन कम और 'दोषारोपण' का खुला मंच ज्यादा था।
दरअसल, यह हार सिर्फ कुछ सीटों की नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस पार्टी की बिहार में उस पकड़ के खत्म होने का संकेत है, जिसे कभी वह अपनी 'जागीर' मानती थी। पार्टी के प्रदेश स्तर के नेताओं का साफ मानना है कि जमीन पर काम करने वालों की अनदेखी और दिल्ली से थोपे गए फैसलों ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा है।
समीक्षा बैठक की 3 बड़ी बातें जो लीक हुईं
RJD पर निर्भरता: कई नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी ने खुद को RJD के 'जूनियर पार्टनर' के रूप में स्वीकार कर लिया है, जिससे कांग्रेस का अपना जनाधार सिमटता जा रहा है।
स्टार प्रचारकों की बेरुखी: स्थानीय नेताओं ने सवाल उठाया कि बड़े और राष्ट्रीय स्तर के स्टार प्रचारकों ने इन महत्वपूर्ण चुनावों में अपेक्षित समय क्यों नहीं दिया, जिससे प्रचार फीका पड़ गया।
'दिल्ली दरबार' का दखल और 'वोट चोरी' का मुद्दा: सबसे तीखी आलोचना हाईकमान के उन 'पर्यवेक्षकों' की हुई, जो ज़मीन पर काम करने के बजाय केवल दिल्ली को खुश करने वाली रिपोर्ट भेजते हैं। साथ ही हाईकमान के फैसलों और वोट चोरी के मुद्दे पर भी सवाल उठाए गए। कहा यह भी जा रहा हाईकमान के 'वोट चोरी' वाले कैंपेन के आगे स्थानीय मुद्दे दब गए।
सवाल उठता है क्या कांग्रेस आलाकमान Rahul Gandhi and Mallikarjun Kharge अब भी उन पुराने चेहरों पर भरोसा कर रहा है, जिन्होंने बिहार में पार्टी को लगातार गर्त में धकेला है? यह सवाल सिर्फ नेताओं का नहीं, बल्कि बिहार के आम कांग्रेस कार्यकर्ता का भी है।
हार की 'इनसाइड स्टोरी' जब 'रणनीति' ही बनी सबसे बड़ी हार
कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी की रणनीति में ही सबसे बड़ी कमजोरी छिपी थी। बिहार में जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे आज भी सबसे बड़े फैक्टर हैं। कांग्रेस इनको साधने की बजाय, 'वोट चोरी' जैसे मुद्दों पर उलझी रही, जिसका सीधा फायदा विरोधियों को मिला।
स्थानीय चेहरे का अभाव: पार्टी एक भी ऐसा कद्दावर स्थानीय चेहरा नहीं खड़ा कर पाई, जो वोटरों को आकर्षित कर सके। सभी बड़े चेहरे या तो दिल्ली में व्यस्त थे, या निष्क्रिय थे।
संगठन की कमजोरी: जिला और ब्लॉक स्तर पर संगठन की कमर टूट चुकी है। चुनाव सिर्फ सोशल मीडिया या बड़े भाषणों से नहीं जीते जाते, बल्कि बूथ स्तर पर मज़बूत संगठन से जीते जाते हैं। बिहार में कांग्रेस का बूथ प्रबंधन सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुआ।
युवाओं की बेरुखी: बिहार का युवा मतदाता जो तेज़ी से जागरूक और डिजिटल हो रहा है, कांग्रेस उसे अपनी ओर खींचने में विफल रही। युवाओं को पार्टी का विजन 'पुराना' और 'अस्पष्ट' लगा। एक कार्यकर्ता ने बैठक में भावुक होते हुए कहा, "हम हर चुनाव में जी-जान लगाकर काम करते हैं, लेकिन दिल्ली से आए आदेश, आखिरी मौके पर उम्मीदवारों का बदलना और गठबंधन में सीटों का तालमेल और कई अन्य मुद्दे जिनका बिहार की जनता से कोई सरोकार नहीं है —ये सब हमारे काम पर पानी फेर देते हैं। हमें अब भी लगता है कि हमारी आवाज़ हाईकमान तक नहीं पहुंचती है।"
हाईकमान की चुप्पी 'परिवर्तन' की मांग
समीक्षा बैठक में हुई तीखी नोक-झोंक और हाईकमान पर लगे आरोपों से यह साफ है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर 2029 के आम चुनाव से पहले पार्टी में कोई बड़ा 'स्ट्रक्चरल चेंज' नहीं किया गया, तो बिहार में कांग्रेस का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।
यह मांग सिर्फ बिहार इकाई की नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसी अन्य राज्य इकाइयों से भी ऐसी ही आवाजें उठ रही हैं।
नेताओं का मानना है कि पार्टी के प्रमुख फैसले लेते समय राज्य इकाई को भरोसे में नहीं लिया जाता।
खुलासा: बैठक में एक प्रस्ताव भी लाया गया था जिसमें यह मांग की गई थी कि प्रदेश अध्यक्ष और अन्य शीर्ष पदों पर 'प्रदर्शन' के आधार पर बदलाव किया जाए।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर तत्काल कोई फैसला नहीं लिया गया, लेकिन इसने हाईकमान पर दबाव जरूर बढ़ा दिया है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार हाईकमान के लिए इन अंदरूनी असंतोष को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होगा। बिहार में कांग्रेस की वापसी की राह तब तक मुश्किल रहेगी, जब तक वह अपनी 'गुलाम मानसिकता' से बाहर नहीं निकलती और एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के तौर पर खड़ी नहीं होती।
क्या RJD से गठबंधन पर पुनर्विचार होगा? क्या राहुल गांधी Rahul Gandhi खुद बिहार की कमान संभालेंगे? क्या पार्टी बिहार के लिए एक नए और आक्रामक चेहरे को आगे लाएगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि बिहार में कांग्रेस की 'बगिया' फिर से हरी होगी, या वह 'सूखकर' अतीत बन जाएगी। पार्टी को अब सिर्फ समीक्षा नहीं, बल्कि सर्जरी की जरूरत है।
कार्यकर्ताओं को चाहिए 'भरपूर ऑक्सीजन' और नेताओं को चाहिए 'जमीनी सच्चाई'।
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