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भूषण स्टील मामला : SC ने क्यों कहा, 'फिर से विचार हो'?

भूषण स्टील मामले में सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर फिर से विचार करेगा, जिससे कॉर्पोरेट ऋण और दिवालियापन कानूनों पर बड़ा असर पड़ सकता है। यह कदम IBC की व्याख्या और फंसे हुए कर्ज की वसूली के लिए एक नया नजीर बन सकता है।

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Ajit Kumar Pandey
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भूषण स्टील मामला : SC ने क्यों कहा, 'फिर से विचार हो'? | यंग भारत न्यूज

भूषण स्टील मामला : SC ने क्यों कहा, 'फिर से विचार हो'? | यंग भारत न्यूज Photograph: (Google)

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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । भूषण स्टील मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख कई सवाल खड़े करता है। आज गुरूवार 31 जुलाई 2025 को शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह ऐसा मामला है जिसमें फैसले पर फिर से विचार करने और मामले को नए सिरे से देखने की जरूरत है। आखिर ऐसा क्या हुआ जो अदालत को अपना ही फैसला पलटने की बात कहनी पड़ी? क्या इससे कॉर्पोरेट ऋण और दिवालियापन से जुड़े कानूनों पर बड़ा असर पड़ेगा? आइए जानते हैं इस पूरे मामले की गहराई।

भूषण स्टील से जुड़ा यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से चल रहा है। हाल ही में एक आदेश में, अदालत ने स्पष्ट किया कि 'यह एक उपयुक्त मामला है जिसमें समीक्षा के तहत निर्णय को वापस बुलाने और मामले पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।' यह टिप्पणी एक जटिल कानूनी पेच को उजागर करती है, जहां पहले दिए गए फैसले पर फिर से गौर करने की बात कही जा रही है। इसका सीधा संबंध कॉर्पोरेट देनदार और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) से जुड़े फैसलों से है। 

कॉर्पोरेट ऋण और IBC का भविष्य

यह मामला सिर्फ भूषण स्टील तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारतीय दिवालियापन संहिता (IBC) के तहत आने वाले कई अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है। IBC का मुख्य उद्देश्य कंपनियों को वित्तीय संकट से उबारना और लेनदारों के हितों की रक्षा करना है। अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही पहले के फैसले पर दोबारा विचार करता है, तो यह IBC के तहत होने वाली कार्रवाईयों के लिए एक नया नजीर बन सकता है। क्या इससे कॉर्पोरेट दिवालियापन के मामलों में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित होगा?

लेनदारों और देनदारों पर असर

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इस न्यायिक प्रक्रिया का सीधा असर उन बैंकों और वित्तीय संस्थाओं पर पड़ेगा जिन्होंने भूषण स्टील को कर्ज दिया था। साथ ही, उन कंपनियों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण घटना होगी जो IBC के दायरे में आती हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम दिखाता है कि कानूनी प्रक्रिया में न्याय और निष्पक्षता कितनी महत्वपूर्ण है। क्या इस पुनर्विचार से फंसे हुए कर्ज (NPA) की वसूली में तेजी आएगी या यह प्रक्रिया को और जटिल बना देगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, उम्मीद है कि मामले की फिर से सुनवाई होगी और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत किस आधार पर अपने पहले के निर्णय पर पुनर्विचार करती है और इसका कॉर्पोरेट क्षेत्र पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। भूषण स्टील का यह मामला भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता और उसकी गहन समीक्षा क्षमता को दर्शाता है।

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