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सिर्फ रूसी तेल ही नहीं! भारत से अमेरिका की चिढ़ के पीछे छिपा है गहरा रहस्य! | यंग भारत न्यूज Photograph: (Google)
नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । भारत और अमेरिका के बीच सब कुछ ठीक नहीं है? हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के एक बयान ने इस सवाल को और गहरा कर दिया है। उन्होंने साफ साफ कहा है कि अमेरिका सिर्फ भारत के रूसी तेल खरीदने से ही नाराज नहीं है, बल्कि इसके पीछे और भी कई गहरी वजहें हैं। आखिर क्या हैं वो कारण जो दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच तनाव पैदा कर रहे हैं? और क्या इसका असर भविष्य में भारत की विदेश नीति पर पड़ेगा? आइए विस्तार से जानते हैं।
इतिहास गवाह है भारत और अमेरिका के बीच के संबंध हमेशा से जटिल रहे हैं। जहां एक ओर दोनों देश लोकतंत्र, व्यापार और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साथ हैं तो वहीं दूसरी ओर चीन के बढ़ते प्रभाव, रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के रुख ने लगातार तनाव पैदा किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का यह बयान इसी तनाव का नतीजा है। यह सिर्फ रूस से तेल खरीदने की बात नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं ज़्यादा है।
आखिर क्या हैं वो तीन मुख्य कारण?
मार्क रूबियो ने अपने बयान में उन कारणों का ज़िक्र किया जो अमेरिका को भारत से असहज महसूस कराते हैं। इन कारणों को समझना भारत के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह न सिर्फ अमेरिका के साथ हमारे संबंधों को प्रभावित करता है, बल्कि हमारी वैश्विक स्थिति को भी परेशान करता है।
1. रूसी हथियारों पर भारत की निर्भरता
भारत दुनिया में रूसी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। हमारी सेना का लगभग 60% साजो-सामान रूस से आता है। S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे भारत ने अमेरिका के दबाव के बावजूद रूस से खरीदा। अमेरिका का मानना है कि रूस से हथियार खरीदने के कारण भारत उसकी सुरक्षा और रणनीतिक योजनाओं के बारे में जानकारी रूस से साझा कर सकता है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ा खतरा है।
इसके अलावा, रक्षा सौदों के मामले में भी भारत रूस को प्राथमिकता देता रहा है, जिससे अमेरिकी रक्षा कंपनियों को नुकसान होता है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए और उसके बजाय अमेरिकी हथियारों की ओर रुख करे। लेकिन भारत के लिए यह इतना आसान नहीं है। रूस के साथ हमारे संबंध दशकों पुराने हैं और वे सिर्फ खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये एक गहरी रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा हैं।
2. स्वतंत्र विदेश नीति का पालन
भारत हमेशा से एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता रहा है, जो किसी भी गुट में शामिल होने से बचती है। शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन इसी का एक हिस्सा था। आज भी, भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है और किसी भी देश के दबाव में नहीं आता। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी, भारत ने तटस्थ रुख अपनाया और यूक्रेन के खिलाफ रूस की कार्रवाई की सीधे तौर पर निंदा नहीं की।
यह भारत का वही रुख है, जो अमेरिका को पसंद नहीं है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ मिलकर चीन और रूस के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बनाए। लेकिन भारत अपने सामरिक हितों को देखते हुए ऐसा करने से बचता है। हमारी स्वतंत्र विदेश नीति ही हमारी ताकत है, और यह अमेरिका के दबाव के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है।
3. चीन के साथ भारत की बढ़ती निकटता
पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े हैं। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव के बावजूद, व्यापार में लगातार वृद्धि हुई है। अमेरिका मानता है कि चीन के साथ भारत के मजबूत होते व्यापारिक संबंध वैश्विक स्तर पर चीन की स्थिति को और मजबूत करते हैं, जो अमेरिका के हितों के खिलाफ है।
अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के खिलाफ उसकी 'फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस' बने। लेकिन भारत जानता है कि चीन के साथ उसके संबंध सिर्फ दुश्मनी के नहीं हैं। व्यापार के अलावा, दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर बातचीत भी जारी है। ऐसे में चीन के साथ संबंधों को पूरी तरह से खत्म करना भारत के लिए संभव नहीं है।
भारत पर क्या होगा इसका असर?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के इस बयान से साफ है कि अमेरिका भारत को अब एक 'डिफॉल्ट पार्टनर' के रूप में नहीं देखता, जो उसकी हर बात मानेगा। यह भारत के लिए एक चुनौती भी है और एक अवसर भी।
यह चुनौती इसलिए है, क्योंकि अमेरिका का दबाव भविष्य में और बढ़ सकता है। हमें अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। वहीं यह अवसर इसलिए है, क्योंकि यह भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को और मजबूत करने का मौका देता है। दुनिया अब सिर्फ अमेरिका और चीन के बीच नहीं बंटी है, बल्कि इसमें भारत जैसे कई और शक्तिशाली देश भी शामिल हैं, जो अपनी शर्तों पर दुनिया से संबंध बनाना चाहते हैं।
भविष्य की राह: क्या भारत और अमेरिका के संबंध सुधरेंगे?
भारत और अमेरिका के संबंध भविष्य में कैसे रहेंगे, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन कितनी मजबूती से करता है। अगर भारत अमेरिकी दबाव में आता है, तो वह अपनी वैश्विक पहचान खो देगा। लेकिन अगर वह अपनी शर्तों पर दुनिया से संबंध बनाता है, तो वह एक असली विश्वशक्ति बन जाएगा। रूसी तेल की खरीद हो या S-400 मिसाइल सिस्टम, भारत को यह संदेश साफ देना होगा कि उसके राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं और वह किसी भी देश के दबाव में नहीं आएगा।
भारत-अमेरिका संबंध में तनाव एक सच्चाई है, लेकिन यह कोई अंत नहीं है। यह सिर्फ एक नया अध्याय है, जिसमें भारत अपनी शर्तों पर दुनिया में अपना स्थान बनाने की कोशिश कर रहा है।
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