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जब-जब America ने दी धमकी, जानिए — तब-तब INDIA ने कैसे दिखाई अपनी ताकत? | यंग भारत न्यूज Photograph: (Google)
नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । गेहूं रोकने की धमकी से लेकर पोखरण परमाणु परीक्षण पर लगे प्रतिबंधों तक, अमेरिका ने समय-समय पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की है। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी अमेरिकी दबाव के आगे घुटने नहीं टेके। इस स्टोरी में हम भारत-अमेरिका संबंधों के उतार-चढ़ाव और भारत की मजबूत विदेश नीति का विश्लेषण करेंगे।
अमेरिका और भारत के बीच संबंध हमेशा सीधे और सहज नहीं रहे हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग के कई क्षेत्र रहे हैं, लेकिन जब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है, तब अमेरिका ने अक्सर दबाव बनाने का प्रयास किया है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता की नीति ने उसे हर बार इन चुनौतियों से उबरने में मदद की है।
आज जब अमेरिका नए सिरे से व्यापारिक दबाव बना रहा है, तब यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत का यह रुख कोई नया नहीं है। चाहे वह शीत युद्ध का दौर रहा हो अथवा साल 1971 का युद्ध हो या फिर पोखरण परमाणु परीक्षण, भारत ने हमेशा अपनी संप्रभुता को सबसे ऊपर रखा है।
शीत युद्ध का दौर: गुटनिरपेक्षता की नीति
शीत युद्ध के दौरान जब दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी तब भारत ने किसी भी गुट में शामिल न होने का फैसला किया। भारत की यह गुटनिरपेक्षता की नीति उसे तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका दोनों से दूर रखती थी। इस नीति के कारण अमेरिका ने कई बार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की।
साल 1965 में जब भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ, तब अमेरिका ने भारत को गेहूं की आपूर्ति रोक देने की धमकी दी थी। उस समय भारत अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए अमेरिकी गेहूं पर काफी हद तक निर्भर था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने 'प्लाविंग एशेज' (ploughing ashes) कार्यक्रम के तहत हर महीने जहाज से आने वाले गेहूं को रोक दिया था। अमेरिका ने सोचा था कि इस दबाव से भारत झुक जाएगा, लेकिन भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाया और हरित क्रांति की शुरुआत की।
क्या आप जानते हैं?
पीएल 480 कार्यक्रम: इस कार्यक्रम के तहत अमेरिका भारत को रियायती दरों पर गेहूं बेचता था। 1960 के दशक में भारत ने इस पर अत्यधिक निर्भरता विकसित कर ली थी।
'शिप टू माउथ' स्थिति: 1960 के दशक के मध्य में भारत में अकाल जैसी स्थिति थी, और देश की खाद्य सुरक्षा पूरी तरह से अमेरिकी जहाजों पर निर्भर थी।
इस घटना के बाद भारत ने यह सुनिश्चित किया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए। हरित क्रांति ने भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया, जिससे अमेरिका की यह धमकी बेअसर हो गई।
1971 का युद्ध और अमेरिकी दबाव
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भी भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस युद्ध में अमेरिका ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था। जब भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में प्रवेश कर रही थी, तब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत को चेतावनी दी थी।
अमेरिका ने अपनी नेवी का सातवां बेड़ा (Seventh Fleet) बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था, जिसका मकसद भारत को डराना था। अमेरिका को लगा था कि इस सैन्य दबाव से भारत पीछे हट जाएगा। लेकिन, भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मजबूती से इसका सामना किया। भारत के तत्कालीन सोवियत संघ के साथ हुए 'शांति, मैत्री और सहयोग समझौते' ने भारत को एक मजबूत रणनीतिक बढ़त दी। सोवियत संघ ने भी अपनी परमाणु पनडुब्बियों को हिंद महासागर में भेजा, जिसके बाद अमेरिकी बेड़ा पीछे हट गया।
पोखरण परमाणु परीक्षण: प्रतिबंधों के बावजूद भारत की दृढ़ता
1974 में भारत ने पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसे 'स्माइलिंग बुद्धा' नाम दिया गया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन भारत ने अपनी परमाणु नीति पर अडिग रहते हुए इस दिशा में आगे बढ़ना जारी रखा।
1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण किया, तब भी अमेरिका ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था ने उनका मजबूती से सामना किया।
इन प्रतिबंधों का उद्देश्य भारत को अपनी परमाणु नीति छोड़ने के लिए मजबूर करना था। लेकिन, भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। भारत के इस मजबूत रुख से दुनिया को यह संदेश गया कि भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
ट्रम्प का कार्यकाल और व्यापारिक दबाव
डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने भारत पर व्यापारिक दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। ट्रम्प ने भारत को 'टैरिफ किंग' कहा और भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी। उन्होंने भारत को व्यापार में 'अनुचित' लाभ उठाने का भी आरोप लगाया।
अमेरिकी दबाव के बावजूद, भारत ने भी पलटवार करते हुए कुछ अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाया। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि वह किसी भी दबाव में नहीं आएगा और अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करेगा। भारत ने अमेरिका के 'जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज' (GSP) कार्यक्रम से बाहर होने के बावजूद अपनी मजबूत व्यापार नीति जारी रखी।
क्या आप जानते हैं?
GSP कार्यक्रम: यह कार्यक्रम अमेरिका द्वारा विकासशील देशों को व्यापार में कुछ छूट देने के लिए चलाया जाता है।
ट्रम्प का 'टैरिफ किंग' बयान: ट्रम्प ने कई मौकों पर भारत को 'टैरिफ किंग' कहकर संबोधित किया, जिसका मकसद भारत पर व्यापारिक दबाव बनाना था।
भारत के इस मजबूत रुख ने यह साबित कर दिया कि वह अब 1960 के दशक का कमजोर राष्ट्र नहीं रहा। आज भारत एक मजबूत आर्थिक शक्ति है और वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
भारत की विदेश नीति: आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता
भारत की विदेश नीति हमेशा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे न झुके। भारत की यह नीति उसे एक विश्व शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
आज भारत रूस से तेल खरीद रहा है, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देश रूस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेगा।
भारत का मजबूत रुख
रूस से तेल खरीद: यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा, अमेरिकी दबाव के बावजूद।
क्वाड (QUAD) और अन्य साझेदारी: भारत विभिन्न देशों के साथ साझेदारी कर रहा है, लेकिन अपनी स्वायत्तता को बनाए रखता है।
सुरक्षा परिषद में सुधार: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग करता है, ताकि वह एक स्थायी सदस्य बन सके।
यह इतिहास हमें बताता है कि भारत ने हर दबाव का सामना किया है और हर बार मजबूत होकर उभरा है। चाहे वह गेहूं की धमकी हो, सैन्य दबाव हो या फिर आर्थिक प्रतिबंध, भारत ने कभी भी अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव से समझौता नहीं किया है।
आज जब भारत 'विश्व गुरु' बनने की दिशा में अग्रसर है, तब यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने इतिहास को याद रखें और भविष्य में भी ऐसे ही अडिग रहें।
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