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मुठभेड़ में गिरफ्तार बदमाश
गाजियाबाद वाईबीएन संवाददाता
गाजियाबाद की विजयनगर थाना पुलिस ने हाल ही में हुई मुठभेड़ में दो शातिर बदमाशों—साकिब और अंशु—को गिरफ्तार कर लिया। इनके पास से अवैध असलाह, नकदी और लूटी गई चेन बरामद हुई है। पहली नज़र में यह खबर आम लगती है, लेकिन इसकी सबसे दिलचस्प और व्यंग्यात्मक बात यह रही कि इस कामयाबी में गाजियाबाद नगर निगम ने भी "बड़ी भूमिका" निभाई।
अजब और दिलचस्प मुठभेड़
दरअसल हुआ यूं कि जब पुलिस बदमाशों का पीछा कर रही थी तो उनकी बाइक सड़क के गड्ढे में फिसल गई। इसके चलते दोनों बदमाश धड़ाम से सड़क पर गिरे और पुलिस के हत्थे चढ़ गए। एसीपी कोतवाली रितेश त्रिपाठी ने खुद यह बयान दिया कि जब पुलिस बदमाशों का पीछे कर रही थी तब सड़क पर एक जगह गद्दा और पानी था जहां बदमाशों की बाइक के चल गई और वह गिर पड़े। यानी कि यह भी कहा जा सकता है कि अगर सड़क पर गड्ढा न होता तो बदमाश आसानी से भाग सकते थे। यानी इस बार अपराधियों के पकड़ने में नगर निगम की कुख्यात "गड्ढा व्यवस्था" ने पुलिस का साथ दिया।अब सोचने वाली बात यह है कि जिस नगर निगम की बदइंतजामी के चलते आम जनता आए दिन दुर्घटनाओं का शिकार होती है, वही लापरवाही इस बार पुलिस की मददगार बन गई। यही वजह है कि इसे “अनचाही साझेदारी” कहा जा सकता है ।
नगर निगम ने की पुलिस की मदद
गाजियाबाद की सड़कों की हालत किसी से छुपी नहीं। जगह-जगह गड्ढे, टूटी सड़कें और जलभराव यहां की पहचान बन चुकी है। आम नागरिक इन गड्ढों में गिरकर घायल होते हैं, कई बार तो मौत तक हो जाती है। हेलमेट पहने हुए लोग तक अक्सर चोटिल हो जाते हैं। लेकिन प्रशासन हर बार मरम्मत और विकास के दावे करता है। सवाल यह है कि अगर ये गड्ढे सचमुच इतने "फायदेमंद" हैं तो फिर क्या प्रशासन अब इन्हें "अपराधियों की पकड़ नीति" का हिस्सा बना देगा?
गड्ढे के चलते गिरे बदमाश
गंभीरता से देखें तो यह पूरा मामला शहर के प्रशासनिक ढांचे पर करारा तमाचा है। पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है और नगर निगम का काम जनता को सुरक्षित व सुगम सड़कें देना। लेकिन यहां हालात उल्टे हैं—पुलिस बदमाश पकड़ रही है और नगर निगम अनजाने में मददगार साबित हो रहा है। आम जनता के लिए यह स्थिति बेहद विडंबनापूर्ण है।इस मुठभेड़ ने एक बार फिर गाजियाबाद की सड़क व्यवस्था की पोल खोल दी है। प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि हर बार अपराधी तो गड्ढों की वजह से नहीं गिरेंगे, लेकिन आम नागरिक रोज़ इन गड्ढों में गिरते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अपराधियों की गिरावट पुलिस की सफलता बन जाती है और आम जनता की गिरावट उसकी बदकिस्मती।
विकट समस्या
अब वक्त आ गया है कि नगर निगम अपनी जिम्मेदारी समझे। सड़कें अपराधियों को पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित यातायात देने के लिए बनाई जाती हैं। अगर सच में कोई "भागीदारी" होनी चाहिए, तो वह पुलिस और जनता के बीच होनी चाहिए, न कि पुलिस और गड्ढों के बीच।यह मुठभेड़ गाजियाबाद के प्रशासन के लिए आईना है—जो दिखा रहा है कि विकास के दावे कितने खोखले हैं। जनता अब सिर्फ गड्ढों से मुक्ति चाहती है, ताकि अपराधियों को पकड़ने के लिए हमें "सड़क हादसों" पर निर्भर न रहना पड़े।