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राजनीतिक दलों के लोगो
गाजियाबाद,वाईबीएन संवाददाता
कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाजियाबाद वह जिला था जहां सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी दलों की गतिविधियां भी प्रशासन और शासन के लिए सिरदर्द बनी रहती थीं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल स्थानीय मुद्दों को लेकर आए दिन धरना-प्रदर्शन, विरोध मार्च और ज्ञापन देने के कार्यक्रम आयोजित करते थे। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। गाजियाबाद में विपक्षी दलों की जमीनी पकड़ कमजोर होती जा रही है। बूथ से लेकर वार्ड स्तर तक संगठन लगभग निष्क्रिय है, जबकि जिला और महानगर स्तर पर नेताओं व पदाधिकारियों की भरमार है। यही कारण है कि किसान आंदोलन के बाद कोई भी विपक्षी दल ऐसा बड़ा आंदोलन नहीं कर पाया, जिसकी गूंज जिले में सुनाई दी हो।
कांग्रेस: पुराने चेहरे, नई जिम्मेदारियां… लेकिन जमीनी असर कम
कांग्रेस ने हाल ही में जिले में बड़े बदलाव किए हैं। लंबे समय से पार्टी से जुड़े देहात निवासी पुराने कांग्रेसी सतीश शर्मा को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि शहर की कमान पूर्व पार्षद और पुराने कांग्रेसी वीर सिंह जाटव को सौंपी गई है। दोनों ही नेताओं की पकड़ राष्ट्रीय स्तर पर भी मानी जाती है। लेकिन नियुक्ति के बाद भी स्थानीय स्तर पर किसी बड़े आंदोलन, अभियान या मुद्दे पर संघर्ष देखने को नहीं मिला है।देहात क्षेत्रों में सतीश शर्मा की गतिविधियां कुछ बढ़ी जरूर हैं, लेकिन महानगर गाजियाबाद में कांग्रेस की मौजूदगी लगभग शून्य है। पार्टी केवल उन्हीं राष्ट्रीय मुद्दों को जिलों में दोहराती नजर आ रही है, जो हाईकमान निर्देशित करता है। स्थानीय समस्याओं — जैसे सफाई, टैक्स, अपराध, नगर निगम की अव्यवस्थाओं — पर कोई ठोस पहल नहीं दिखती।कांग्रेस जिलाध्यक्ष सतीश शर्मा का कहना है कि लंबे समय से चुनावी हार के चलते कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में बूथ और वार्ड स्तर पर संगठन को मजबूत करने की कवायद जारी है। उन्होंने दावा किया कि एसआईआर और पंचायत चुनाव की तैयारियों में पार्टी जमीनी रूप से काम कर रही है।
बसपा: आंतरिक कलह और पैराशूट पदाधिकारियों से कमजोर हुई पकड़
पिछले कई चुनावों से लगातार खराब प्रदर्शन झेल रही बहुजन समाज पार्टी की हालत जिले में सबसे ज्यादा खराब मानी जा रही है। पार्टी में लगातार पदाधिकारियों की अदला-बदली, आंतरिक कलह, फोन पर नेताओं की अभद्र भाषा और कार्यकर्ताओं से तकरार जैसी घटनाओं ने बहनजी की अनुशासित पार्टी की छवि को धूमिल किया है।जमीनी कार्यकर्ताओं को पद देने की पुरानी परंपरा अब खत्म हो गई है। जिला, महानगर और मंडल स्तर पर “पैराशूट पदाधिकारी” नियुक्त किए जा रहे हैं, जो सीधे ऊपर से भेजे जाते हैं। इसका असर यह है कि बसपा लंबे समय से जिले में कोई बड़ा आंदोलन तक नहीं कर सकी। हाईकमान द्वारा तय कार्यक्रमों के अलावा बसपा की जिले में गतिविधियां लगभग ना के बराबर हैं।बसपा जिलाध्यक्ष मनोज जाटव का कहना है कि भले ही पिछले कुछ वक्त में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा हो, लेकिन अब संगठन फिर से मजबूती के साथ काम कर रहा है और पंचायत चुनाव के परिणाम पार्टी के पक्ष में आएंगे। आंतरिक कलह पर उन्होंने प्रतिक्रिया देने से इनकार किया।
समाजवादी पार्टी: नेताओं की भरमार, कार्यकर्ता नदारद
सपा की जिले में स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। बूथ और वार्ड स्तर की कमेटियां लगभग निष्क्रिय हो चुकी हैं। कार्यकर्ता कम और नेता ज्यादा दिखाई देते हैं — वह भी जिला स्तर ही नहीं बल्कि प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक के। सपा के कई बड़े चेहरे गाजियाबाद की गलियों में आसानी से मिल जाएंगे, लेकिन स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन में उनकी उपस्थिति नगण्य रहती है।पार्टी के बड़े नेता सिर्फ अखिलेश यादव या अन्य राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों में मंच पर और प्रचार गाड़ियों में ही दिखाई देते हैं। स्थानीय स्तर पर किसी भी विरोध, संघर्ष या आंदोलन में उनकी सक्रियता लगभग शून्य है।सपा जिलाध्यक्ष फैजल हुसैन का कहना है कि विपक्ष की भूमिका जिले में सबसे ज्यादा दमदार तरीके से समाजवादी पार्टी निभा रही है। एसआईआर के मुद्दे पर गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया गया है। नगर निगम टैक्स बढ़ोतरी के मामले को भी सपा ने सबसे पहले उठाया था। उन्होंने कहा कि पंचायत चुनाव में सपा फिर से जनहित से जुड़े मुद्दों को आक्रामक रूप से उठाएगी।
बूथ और वार्ड स्तर पर विपक्ष का खत्म होता ढांचा
गाजियाबाद में विपक्षी दलों के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण बूथ और वार्ड स्तर पर संगठन का लगभग खत्म हो जाना है। भाजपा जहां लगातार अपने बूथ समितियों, पन्ना प्रमुखों और कार्यकर्ता नेटवर्क को मजबूत कर रही है, वहीं विपक्षी दलों में यह बुनियादी संरचना लगभग ध्वस्त हो चुकी है।जनता की समस्याओं— जैसे कर बढ़ोतरी, पानी की किल्लत, सुरक्षा, ट्रैफिक अव्यवस्थाओं— को उठाने में भाजपा बरकरार सक्रिय है, जबकि विपक्ष इस जिम्मेदारी को निभाने में पिछड़ता जा रहा है।
विपक्ष का भविष्य जमीनी स्तर की मजबूती पर निर्भर
गाजियाबाद में विपक्षी दलों का कमजोर होना आने वाले चुनावों में उनके लिए बड़ा खतरा है। केवल जिला या प्रदेश स्तर के नेता होने से पार्टी नहीं चलती, बल्कि जमीनी कार्यकर्ता ही किसी भी राजनीतिक संगठन की रीढ़ होते हैं। जब तक कांग्रेस, सपा और बसपा बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं करेंगी और स्थानीय समस्याओं पर आक्रामक रुख नहीं अपनाएंगी, तब तक प्रदेश में भाजपा के सामने प्रभावी विपक्ष खड़ा होने की संभावना कम ही दिखती है।
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