– नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म के दोषी पिता को आजीवन कारावास Photograph: (वाईबीएन )
शाहजहांपुर, वाईबीएन संवाददाता। जनपद में मानवता और बाप-बेटी के पवित्र रिश्ते को शर्मसार करने वाले एक मामले में विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) शिव कुमार तृतीय ने कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपी पिता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह घटना समाज के लिए एक बदनुमा दाग है, जहां रक्षक ही भक्षक बन गया। अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों और डीएनए रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया।
​क्या था पूरा मामला?
​घटना खुदागंज थाना क्षेत्र के एक गांव की है। मार्च 2022 में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, पीड़िता की मां ने बताया कि वह नामकरण संस्कार में शामिल होने गई थी। वह अपने दोनों बेटों को साथ ले गई थी, जबकि घर पर उसका पति और नाबालिग बेटी अकेले थे।
​मां की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए पिता ने अपनी ही बेटी को हवस का शिकार बनाया। इस कृत्य से आहत होकर और लोकलाज के डर से बेटी ने सिंघाड़े की खेती में इस्तेमाल होने वाली जहरीली दवा पी ली।
​अस्पताल में खुला राज
​बेटी की हालत बिगड़ने पर जब उसे अस्पताल ले जाया गया, तो मां ने उससे जहर पीने का कारण पूछा। तब पीड़िता ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उसने बताया कि पिता ने उसके साथ दुष्कर्म किया है और यह पहली बार नहीं था। बेटी के इस खुलासे के बाद मां ने पति के खिलाफ थाने में मुकदमा दर्ज कराया।
​डीएनए रिपोर्ट ने खोली पोल
​विवेचना के दौरान पुलिस ने पीड़िता के कपड़े और अन्य साक्ष्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला (Forensic Lab) भेजे थे। ​जांच में कपड़ों पर मिले शुक्राणु और रक्त के धब्बों का मिलान आरोपी पिता के डीएनए से कराया गया, जो पूरी तरह मैच हो गया। ​यह वैज्ञानिक सबूत कोर्ट में आरोपी को दोषी साबित करने में सबसे अहम कड़ी साबित हुआ।
​5 साल की उम्र से हो रहा था शोषण
​कोर्ट में मुख्य परीक्षा (गवाही) के दौरान पीड़िता ने जो बयान दिया, उसने सभी को सन्न कर दिया। पीड़िता ने बताया कि जब वह महज 5-6 साल की थी, तब से उसका पिता उसके साथ घिनौनी हरकतें कर रहा था। इतने सालों तक वह डर और पिता के दबाव के कारण चुप रही, लेकिन जहर पीने वाली घटना के बाद उसका सब्र टूट गया।
​साइड स्टोरी: दरकते रिश्ते और सामाजिक जिम्मेदारी
​हेडिंग: जब रक्षक ही बन जाए भक्षक: कैसे बचाएं हम अपने घर की नींव?
​शाहजहांपुर की यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि गिरते सामाजिक मूल्यों और विकृत होती मानसिकता का प्रमाण है। पिता, जिसे बेटी की सबसे मजबूत ढाल माना जाता है, जब वही शोषण करने लगे तो विश्वास किस पर किया जाए? यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर क्या चल रहा है। मनो विश्लेषक डा रोहिताश इंसा ने रिश्तों को बचाने के लिए टिप्स दिए हैं।
​रिश्तों को कैसे बचाएं?
​संवाद (Communication): परिवार में डर का माहौल नहीं, बल्कि खुलेपन का माहौल होना चाहिए। बच्चों को इतना भरोसा हो कि वे किसी भी गलत हरकत के बारे में अपनी मां या अन्य सदस्यों को बता सकें।
​माताओं की भूमिका: इस केस में मां की भूमिका सराहनीय रही। उसने लोकलाज की परवाह किए बिना बेटी का साथ दिया और पति को सजा दिलाई। हर मां को अपने बच्चों की हर गतिविधि और हाव-भाव पर नजर रखनी चाहिए।
​नैतिक शिक्षा: समाज में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा भी जरूरी है।
​मनोचिकित्सक की राय (Expert Advice)
मनोविश्लेषक ​डॉ. रोहिताश इंसा के अनुसार ​इस तरह के मामलों में अपराधी अक्सर 'पिडोफिलिया' या गंभीर मानसिक विकृति से ग्रस्त होते हैं, या फिर उनमें कानून और नैतिकता का कोई भय नहीं होता।
​पैरेंट्स और समाज के लिए टिप्स:
​गुड टच और बैड टच: बच्चों को 3-4 साल की उम्र से ही 'गुड टच' और 'बैड टच' के बारे में सिखाना शुरू करें, चाहे वह घर का सदस्य ही क्यों न हो।
​व्यवहार में बदलाव पर नजर रखें: अगर बच्चा अचानक गुमसुम रहने लगे, अकेले में डरे, या किसी विशेष व्यक्ति के पास जाने से कतराए, तो इसे नजरअंदाज न करें।
​विश्वास जीतें: बच्चे को विश्वास दिलाएं कि कोई भी उन्हें डरा-धमका कर चुप नहीं रख सकता। "हम तुम्हारे साथ हैं" - यह वाक्य बच्चे को बड़ी से बड़ी मुसीबत से लड़ने की ताकत देता है।
​अकेलापन: कोशिश करें कि बच्चों को, खासकर बेटियों को, लंबे समय तक घर में ऐसे व्यक्तियों के साथ अकेला न छोड़ें जिन पर रत्ती भर भी संदेह हो या जिनका व्यवहार संदिग्ध हो।
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