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गलत था जज का फैसला, सरकार ने कर दिया बर्खास्त पर HC को नहीं दिखा कोई खोट

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक कदाचार के स्पष्ट आरोप न हों, केवल इस आधार पर कि कोई आदेश गलत पारित किया गया है अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जानी चाहिए।

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Shailendra Gautam
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कोर्ट की डीएम को चेतावनी Photograph: (YBN)

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्कः गुजरात हाईकोर्ट ने अपने आप में एक अनूठा फैसला दिया है। उसने एक ऐसे जज की नौकरी को बहाल करने का आदेश दिया इन्क्वायरी में जिसके फैसले गलत साबित हो चुके थे। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल गलत फैसला देना नौकरी से हटाने का आधार नहीं हो सकता। सरकार से कहा गया है कि वो जज को नौकरी पर बहाल करे। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक कदाचार के स्पष्ट आरोप न हों, केवल इस आधार पर कि कोई आदेश गलत पारित किया गया है अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जानी चाहिए।

2011 में गुजरात सरकार ने जज को कर दिया था टर्मिनेट

आरोपी जज ने गुजरात सरकार की 6 मई 2011 को पारित उस अधिसूचना को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था, जिसमें गुजरात सिविल सेवा (अनुशासनात्मक और अपील) नियम 1971 के नियम 6(8) के तहत उसको बर्खास्तगी कर दिया गया था। याचिकाकर्ता को 1996 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) और न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) के रूप में नियुक्त किया गया था। उसे 2005 में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर पदोन्नत किया गया था। याचिकाकर्ता को 23 अक्टूबर 2008 को चार्जशीट जारी की गई थी, जब वह भुज के कच्छ जिले में कार्यरत थे। चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 27 अगस्त 2007 को एक सिविल मुकदमे में टैंकरों के मालिकों को एक पक्षीय निषेधाज्ञा दी थी। टैंकरों का मामला लंबित था।

जज ने एक पक्ष को पहुंचाया था गलत तरीके से फायदा

जज पर यह भी आरोप है कि उसने मेसर्स जय अंबिका ऑयल कैरियर्स के साझेदार द्वारा मुकदमे में पक्षकार के रूप में शामिल होने के लिए दायर आवेदन को नजरअंदाज कर दिया और इसके बजाय प्रतिवादी यानी एस्सार ऑयल लिमिटेड को टैंकरों का कब्जा वादी को सौंपने के लिए मजबूर किया। आरोप है कि याचिकाकर्ता ने करप्शन करने के साथ अपने काम में भी कोताही बरती। मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया तो उसके बाद एक जांच की गई। याचिकाकर्ता के खिलाफ चार आरोपों को सूचीबद्ध करते हुए एक आरोपपत्र दायर किया गया, जिसमें से केवल पहला आरोप साबित हुआ। सरकार ने उसे नौकरी से हटा दिया। 

नौकरी तो मिली पर आरोपी जज के खिलाफ खुली पुरानी जांच

हाईकोर्ट ने आरोपी जज को अतिरिक्त वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश और संयुक्त वित्तीय आयुक्त (जेएमएफसी) के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया। आदेश में कहा गया कि 2008 में याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज की गई एक विभागीय जांच को फिर से शुरू किया जाए। जज पर आरोप लगाया गया था कि उसने बिल्डर से डेढ़ लाख रुपये लिए थे और भूकंप पीड़ित द्वारा दायर दीवानी मुकदमे को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि जांच को उसे उसी चरण से शुरू किया जाना चाहिए जहां वह बंद हुई थी। हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया कि नौकरी से हटाए गए जज को छह सप्ताह के भीतर बहाल किया जाएगा। 

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