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Photo: @RSSorg & @yadavakhilesh
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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क: आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र को लेकर दिए गए बयान पर देश की राजनीति में हलचल मच गई है। इसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक टिप्पणी करते हुए बिना किसी का नाम लिए निशाना साधा।
बिना नाम के साधा निशाना
सपा प्रमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर बिना किसी का नाम लिए लिखा कि "न रिटायर होऊंगा, न होने दूंंगा। जब अपनी बारी आई तो नियम बदल दिए ये दोहरापन अच्छा नहीं। अखिलेश ने आगे कहा कि अपनी बात से पलटने वालों पर पराया तो क्या कोई अपना भी विश्वास नहीं करता। जो विश्वास खोते हैं वो राज भी खो देते हैं। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर मोहन भागवत या संघ का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा स्पष्ट रूप से उसी दिशा में माना जा रहा है।अखिलेश यादव का यह बयान साफ तौर पर भाजपा और संघ नेतृत्व पर कटाक्ष के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से उस चर्चा के संदर्भ में जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन के बाद सक्रिय राजनीति से हटने की अटकलें लगाई जा रही थीं।
यह बोले मोहन भागवत
दरअसल हाल ही में नागपुर में आयोजित कार्यक्रम '100 वर्ष की संघ यात्रा नए क्षितिज' में सरसंघचालक मोहन भागवत से जब रिटायरमेंट की उम्र के बारे में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ किया कि संघ में कोई उम्रसीमा तय नहीं होती। भागवत ने कहा कि मैंने कभी नहीं कहा कि 75 साल की उम्र में रिटायर हो जाना चाहिए। न तो मैंने अपने लिए ऐसा कहा और न ही किसी और के लिए। मैंने केवल पूर्व संघ नेता मोरोपंत पिंगले के विचारों का हवाला दिया था। अगर संघ कहेगा कि 80 की उम्र में भी शाखा चलाओ तो मैं चलाऊंगा। जब तक संघ की आवश्यकता है तब तक हम काम करते रहेंगे।
मोदी भी इस अनौपचारिक नियम का पालन करेंगे या नहीं
मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के पीएम नरेंद्र मोदी अगले महीने 75 वर्ष के होने वाले हैं। अतीत में कई भाजपा नेताओं को 75 की उम्र पार करने के बाद सक्रिय राजनीति से मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया था। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और अन्य वरिष्ठ नेता इसके उदाहरण हैं। ऐसे में यह अटकलें चल रही थीं कि मोदी भी इस अनौपचारिक नियम का पालन करेंगे या नहीं। अब मोहन भागवत द्वारा 75 की उम्र को रिटायरमेंट की सीमा मानने से इनकार करना और फिर अखिलेश यादव का "न रिटायर होऊंगा, न होने दूंगा" जैसा तंज यह संकेत करता है कि विपक्ष इस मुद्दे को उछालेगा।
दोहरापन या नीति में बदलाव?
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ और भाजपा की नीतियों में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं, लेकिन जब ये बदलाव व्यक्तिगत लाभ के लिए किए जाएं, तो विपक्ष को हमला करने का अवसर मिल जाता है। अखिलेश यादव का बयान भी इसी दोहरेपन पर सवाल उठाता दिखता है।मोहन भागवत के बयान ने एक बार फिर से राजनीति में रिटायरमेंट की उम्र और सक्रिय भागीदारी को लेकर बहस छेड़ दी है। क्या राजनीति में उम्र की कोई सीमा होनी चाहिए? क्या वरिष्ठ नेताओं को अनुभव के आधार पर सक्रिय रहना चाहिए या नई पीढ़ी के लिए मार्ग छोड़ देना चाहिए? ये सवाल आने वाले समय में और तीखे हो सकते हैं।
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