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Crime News : अमित ठाकुर की मौत को पहले बताया गया हादसा , अब साथियों पर धक्का देकर डुबोने का आरोप, मुकदमा दर्ज

गोमती नदी से मिले छात्र अमित की मौत के मामले में कोर्ट के आदेश पर उसके सात दोस्तों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज किया गया है। पीड़ित पिता ने आरोप लगाया है कि दोस्तों ने झगड़े के बाद अमित को नदी में धक्का दिया था।कोर्ट में गुहार लगाने के बाद FIR दर्ज की गई।

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Shishir Patel
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फाइल फोटो

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लखनऊ, वाईबीएन संवाददाता। राजधानी के गोमती नदी में 25 मई को मिले स्नातक छात्र अमित ठाकुर (19) की रहस्यमयी मौत का मामला अब हत्या की ओर मुड़ गया है। परिजनों की लगातार कोशिश और पुलिस के निष्क्रिय रवैये के बाद आखिरकार कोर्ट के हस्तक्षेप पर सात युवकों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। मामला लखनऊ के आलमबाग थाने में दर्ज हुआ है।

25 मई को उसके शव की बरामदगी गोमती नदी से हुई थी

अमित ठाकुर आलमबाग के श्रम विहार कॉलोनी का निवासी था। 25 मई को उसके शव की बरामदगी गोमती नदी से हुई थी, जिसे पुलिस ने उस समय एक हादसा मानते हुए फाइल बंद करने की कोशिश की। लेकिन अमित के पिता अनिल ठाकुर ने बेटे की मौत पर शुरू से ही संदेह जताते हुए इसे हत्या बताया।पीड़ित पिता का आरोप है कि 25 मई की सुबह अमित के सात दोस्त—पीयूष शर्मा, अमन शर्मा, आदि शर्मा, शिवम शर्मा, शिवा शर्मा, विशाल साहनी और रवि—उसे घर से यह कहकर ले गए कि वह ठाकुरगंज स्थित प्रेरणा स्थल पर नहाने चलें। वहां किसी बात को लेकर विवाद हुआ और झगड़ा बढ़ गया। पिता का आरोप है कि साथियों ने झगड़े के दौरान अमित को जानबूझकर गोमती नदी में धक्का दे दिया, जिससे उसकी डूबकर मौत हो गई।

पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर शुरू की जांच 

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पुलिस ने शुरुआती दौर में परिजनों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया। आलमबाग थाने में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, अनिल ठाकुर ने घटना के तुरंत बाद थाने में हत्या की तहरीर दी थी, लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। आखिरकार उन्होंने कोर्ट का रुख किया। कोर्ट के आदेश के बाद 28 जुलाई को सातों आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा आईपीसी की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया।इंस्पेक्टर आलमबाग सुभाष चंद्र ने पुष्टि करते हुए बताया कि कोर्ट के निर्देश पर सातों नामजद युवकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है और अब आगे की विवेचना की जा रही है।यह मामला न केवल दोस्ती के नाम पर छिपी हिंसा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कभी-कभी परिजनों को न्याय पाने के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विवेचना कितनी निष्पक्ष और प्रभावी होती है।

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