/young-bharat-news/media/media_files/2025/08/29/29-aug-8-2025-08-29-23-02-24.png)
प्रतीकात्मक Photograph: (सोशल मीडिया)
लखनऊ, वाईबीएन संवाददाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पुलिस के पास उसकी पसंद या नापसंद के आधार पर किसी व्यक्ति की हिस्ट्रीशीट खोलने की निरंकुश शक्ति प्राप्त नहीं है। पुलिस किसी व्यक्ति की पसंद या नापसंद के आधार पर उसके खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोलने में 'अनियंत्रित' और 'अनैतिक' शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि उचित संदेह पैदा करने के लिए ठोस और विश्वसनीय सामग्री की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमावली के नियम 228 और 240 पुलिस को इसका इस तरह इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं देता हैं, जिससे नागरिक की मौलिक स्वतंत्रता का हनन हो।
किसी का भी नाम दर्ज करने का लाइसेंस नहीं
न्यायालय ने कहा कि पुलिस के पास निगरानी रजिस्टर में अपनी पसंद या नापसंद के किसी का भी नाम दर्ज करने का लाइसेंस नहीं है। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस संतोष राय की खंडपीठ ने सिद्धार्थनगर के पुलिस अधीक्षक के जून 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता (मोहम्मद वजीर) की हिस्ट्रीशीट बंद करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी।
याची वजीर के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस अधिनियम के तहत केवल एक मामला दर्ज था। 2016 में गोहत्या अधिनियम के तहत उन पर आरोप लगाए गए और वह मुकदमा चल रहा है, लेकिन उनके खिलाफ कोई अन्य एफआईआर, एनसीआर या शिकायत दर्ज नहीं की गई है।
केवल एक मामले के आधार पर हिस्ट्रीशीट खोली
चूंकि याची के खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोली गई थी, इसलिए उसने संबंधित एसपी से इसे बंद करने का अनुरोध किया था। हालांकि, 23 जून, 2025 को पुलिस नियम 228 और 240 का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया गया। पीड़ित याची ने हाईकोर्ट का रुख किया और कहा कि हिस्ट्रीशीट खोलना गलत था, क्योंकि यह बिना किसी ठोस व विश्वसनीय सामग्री के किया गया था और उत्तर प्रदेश पुलिस नियमावली के पैरा 228, 229, 231, 233 और अन्य प्रासंगिक नियमों का उल्लंघन था। यह तर्क भी दिया गया कि पुलिस अधिकारियों ने केवल एक घटना/मामले के आधार पर हिस्ट्रीशीट खोली, जो 8 साल पहले दर्ज की गई थी।
अभ्यावेदन को बहुत ही लापरवाही से खारिज कर दिया
कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर, केवल पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्तियों के नाम ही निगरानी रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं, और ऐसे व्यक्ति घोषित अपराधी, पूर्व में दोषी ठहराए गए व्यक्ति या अच्छे आचरण के लिए पहले से ही जमानत पर रखे गए व्यक्ति होने चाहिए।
न्यायालय ने आगे कहा कि जिन व्यक्तियों के बारे में उचित रूप से माना जाता है कि वे आदतन अपराधी या चोरी की संपत्ति प्राप्त करने वाले हैं, चाहे उन्हें दोषी ठहराया गया हो या नहीं, उन्हें पुलिस विनियमन के तहत निगरानी रजिस्टर में वर्गीकृत और दर्ज किया जा सकता है। इस पृष्ठभूमि में, पीठ ने पाया कि पुलिस अधीक्षक ने बिना किसी सामग्री के याची के अभ्यावेदन को "बहुत ही लापरवाही से" खारिज कर दिया, जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस के पास यह साबित करने के लिए कुछ भी नहीं था कि याचिकाकर्ता विनियमन 228(ए) द्वारा परिकल्पित अपराध की प्रकृति में शामिल है और निश्चित रूप से याची का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
खंडपीठ( Allahabad High Court) ने आदेश में आगे कहा कि गोहत्या अधिनियम के तहत आठ साल पुराना एक मामला याचिकाकर्ता को आदतन अपराधी नहीं बनाता। इसके अलावा, गोविंद बनाम मध्य प्रदेश राज्य, 1975 और मलक सिंह आदि बनाम पंजाब एवं हरियाणा राज्य एवं अन्य, 1980 के मामलों में शीर्ष अदालत के फैसलों का हवाला देते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि पुलिस विनियमों में कानूनी बल तो है, लेकिन उनका दुरुपयोग नागरिकों पर मनमाने ढंग से निगरानी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि हिस्ट्रीशीट खोलने के समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं है। इसलिए कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया और याचिका मंजूर कर ली।
यह भी पढ़ें- पूर्व सांसद उमाकांत यादव को हाई कोर्ट से राहत, हत्याकांड में मिली उम्रकैद सस्पेंड
यह भी पढ़ें- नटकुर में 15 दिनों से लटक रही एबीसी लाइन, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
Allahabad High Court hearing | latest up news | up news | UP news 2025 | up news hindi