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निजी संस्था के 'सचिवालय' में निजीकरण प्रकिया आगे बढ़ाने की रणनीति Photograph: (google)
लखनऊ, वाईबीएन संवाददाता। यूपी की बिजली कंपनियों का राजस्व से निजी संस्था ऑल इंडिया डिस्काम एसोसिएशन को करोड़ों रुपये सदस्यता शुल्क और चंदा देने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। संस्था को लेकर हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के ताजा खुलासे में सामने आया कि संस्था ने दिल्ली में अपना कार्यालय भी खोला है। पावर कारपोरेशन के अधिकारी, रिटायर्ड अफसर और निजी घराने मिलकर यहां प्रदेश में निजीकरण की प्रकिया को आगे बढ़ाने की रणनीति तैयार कर रह हैं।
डिस्कॉम एसोसिएशन की सात कमेटियां
परिषद के मुताबिक, डिस्काम एसोसिएशन ने करीब सात कमेटियां बनाई हैं। इसमें प्रदेश की सभी बिजली कंपनियों के ज्यादातर निदेशक, मुख्य अभियंता, अदाणी पावर के एमडी, टाटा पावर के सीईओ, एनपीसीएल के एमडी और निजी घरानों के उच्चाधिकारी शामिल हैं। इन कमेटियों के जरिए ऊर्जा विभाग का अहम डाटा साझा किया जा रहा है। ऐसे में गोपनीय दस्तावेज बेहद आसानी से निजी घरानों तक पहुंच सकते हैं। परिषद का आरोप है कि प्रदेश के 42 जनपदों की बिजली आपूर्ति व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने लिए एसोसिएशन पर्दे के पीछे से पैरवी कर रहा है।
रिटायर्ड अधिकारी संस्था में बड़े पदों पर
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाते हुए कहा कि ऊर्जा विभाग के रिटायर्ड अधिकरी इस संस्था में बड़े पद हैं। इन्हें लाखों रुपये मिल रहे हैं। इसमें निदेशक प्रशासन को प्रतिमाह 2 लाख, निदेशक रेगुलेटरी अफेयर्स को तीन लाख, निदेशक तकनीकी की को तीन लाख और रिसर्च अफसर की तनख्वाह करीब 80 हजार है। जबकि पूर्व केन्द्रीय सचिव रहे संस्था में महानिदेशक आलोक कुमार को मोटा वेतन मिला रहा है। वर्मा ने केंद्र और राज्य सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए निजी संस्था के दफ्तर को सील कर सीबीआई जांच की मांग की है।
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