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प्रतीकात्मक Photograph: (सोशल मीडिया)
लखनऊ, वाईबीएन संवाददाता। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। संयोजन में नियमों की अनदेखी और मनमाने तरीके से शिक्षकों को विद्यालय आवंटित करने का आरोप लगाते हुए 23 मई को जारी शासनादेश को रद्द करने की मांग की गई है। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने इस मामले में परिषद और राज्य सरकार सहित सभी पक्षों को जवाब व प्रति उत्तर शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है।
नौ लोगों की तरफ से दायर की गई याचिका
अनिल कुमार और आठ अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर याचियों की ओर से अधिवक्ता अग्निहोत्री कुमार त्रिपाठी का कहना था कि शिक्षा का अधिकार नियमावली के नियम 21 के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में समायोजन का अधिकार जिलाधिकारी को है, मगर यह काम सचिव बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा किया जा रहा है, जिसका उनको अधिकार नहीं है। याचिका में कहा गया कि सचिव ने मनमाने तरीके से सरप्लस और कम छात्र संख्या वाले स्कूल घोषित किए हैं। यू डायस पर दिया गया छात्र, शिक्षक अनुपात भी सही नहीं है। यह किस सत्र का है, यह भी स्पष्ट नहीं है। इसको जिलाधिकारी द्वारा वेबसाइट पर अपलोड भी नहीं किया गया है।
अधिवक्ता की दलील थी कि ऐसे विद्यालयों को भी एकल घोषित कर दिया गया, जिनमें 60 तक छात्र संख्या थी। इसी प्रकार से 150 तक की छात्र संख्या वाले विद्यालयों के हेड मास्टरों को सरप्लस कर दिया गया, जबकि सरप्लस घोषित करने के एक मामले में लखनऊ खंडपीठ ने रोक लगाई हुई है। इसी प्रकार से शिक्षकों का समायोजन करते समय 100 तक छात्र संख्या वाले विद्यालयों में विषय अध्यापकों का ध्यान नहीं रखा गया और एक ही विषय के कई अध्यापकों को एक ही विद्यालय में समायोजित कर दिया गया। याचिका में एक जुलाई को जारी स्थानांतरण सूची को भी रद्द करने की मांग की गई है। कोर्ट(Allahabad High Court ) ने इस मामले में आठ सप्ताह में जवाब मांगा है।
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