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सांकेतिक तस्वीर( पाकिस्तान का अरोर कस्बा)
दिल्ली ,वाईबीएन डेस्क।अरोड़ा समुदाय भारत का एक प्रमुख व्यापारिक और वैश्य समुदाय है, जो आमतौर पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में बहुतायत में निवास करते हैं। लेकिन अरोड़ा समाज की ऐतिहासिक जड़ें विभाजन से पहले के पाकिस्तान में मौजूद हैं। यह समुदाय सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पाकिस्तान के कई हिस्सों से गहराई से जुड़ा हुआ है। अरोर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सुक्कर जिले में स्थित एक शहर है, जिसे वर्तमान में रोहरी के नाम से जाना जाता है। इनकी उत्पत्ति खत्री से हुई है। यह खत्रियों की एक उपजाति है। ऐसी मान्यता है कि खत्री , लाहौर और मुल्तान के खत्री हैं, जबकि अरोड़ा पाकिस्तान के आरोर, यानी कि आधुनिक रोहरी और सुक्कर (सिंध) के खत्री हैं। ऐतिहासिक रूप से, यह समुदाय मुख्य रूप से पश्चिमी पंजाब में लाहौर के दक्षिण और पश्चिम जिलों में पाया जाता था।
ऐतिहासिक फैक्ट
अरोड़ा समुदाय की उत्पत्ति सिंधु घाटी और पंजाब क्षेत्र से मानी जाती है, जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है।
अरोड़ा शब्द "अरोर" नामक एक प्राचीन नगर से लिया गया है, जो वर्तमान में रोहड़ी (Rohri), सिंध, पाकिस्तान में स्थित है। इस नगर(कस्बे) को अरोड़ा समुदाय का मूल स्थान माना जाता है। इसी शहर के कारण कहा जाता है कि अरौरा से अरोड़ा बना, जो आज प्रचलित और लोकप्रिय उपनाम हैं। इसउपनाम के लोग अधिकांशत व्यवसाय से जुडे़ होते हैं, लेकिन कई ऐसी हस्तियां भी हैं, जो अरोड़ा थे।
बंटवारे से पहले की स्थिति
भारत के बंटवारे से पहले अरोड़ा समुदाय पाकिस्तान के पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में बसे हुए थे। वे प्रायः व्यापारी, साहूकार, डॉक्टर, शिक्षक और सरकारी कर्मचारी हुआ करते थे। लाहौर, मुल्तान, पेशावर, रोहड़ी, कराची, हैदराबाद (सिंध), और रावलपिंडी जैसे शहरों में इनकी अच्छी खासी उपस्थिति थी।
विभाजन और विस्थापन का दंश
वर्ष 1947 के भारत-पाक विभाजन के दौरान अरोड़ा समुदाय को भी अन्य हिंदू और सिख समुदायों की तरह पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। उन्होंने बड़े पैमाने पर भारत के पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर भारत के अन्य भागों में शरण ली। विभाजन की पीड़ा और विस्थापन ने अरोड़ा समुदाय की सामाजिक बनावट को गहराई से प्रभावित किया। इसका समुदाय पर काफी असर हुआ, लेकिन परिश्रम और एकजुटता से इन्होंने समाज में एक अलग तरह का मुकाम हासिल किया।
धार्मिक मान्यताएं और दृष्टिकोण
अधिकांश अरोड़ा हिंदू अथवा सिख होते हैं, लेकिन विभाजन से पहले कई अरोड़ा पाकिस्तान में अपने धार्मिक रीति-रिवाज़ों के अनुसार पूजा-पाठ और गुरुद्वारों में सेवा करते थे। गुरुद्वारा रोहड़ी साहिब जैसे कई धार्मिक स्थल आज भी पाकिस्तान में मौजूद हैं, जो अरोड़ा इतिहास से जुड़े हैं। हिंदू धर्म को मानने वाले देवी हिंगलाज की आराधना करते हैं। इनकी कुलदेवी मां हिंगलाज कहलाती हैं।
आज का परिदृश्य
आज के दौर में भारत में अरोड़ा समुदाय ने व्यापार, शिक्षा, राजनीति और चिकित्सा क्षेत्रों में काफी तरक्की की है। लेकिन अरोड़ा परिवारों में अब भी "हम पाकिस्तान से आए थे" जैसी यादें और किस्से पीढ़ियों में सुनाए जाते हैं। कुछ अरोड़ा परिवार अब भी अपने पुरखों की हवेलियों, मंदिरों या गांवों की यादें पाकिस्तान से जोड़ते हैं।
सांस्कृतिक प्रभाव
अरोड़ा समुदाय की बोली, खाना-पीना, पहनावा और सामाजिक परंपराएं आज भी विभाजन से पहले के पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) की झलक दिखाती हैं। पंजाबी और सिंधी भाषा की झलक उनके व्याकरण, उच्चारण और बोलचाल में दिखती है। अरोड़ा समुदाय का पाकिस्तान से संबंध केवल भौगोलिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक भी है। भले ही आज वे भारत में समृद्ध और सफल जीवन जी रहे हों, लेकिन उनकी जड़ें आज के पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में गहराई से जुड़ी हुई हैं। विभाजन ने उन्हें उनके मूल स्थानों से तोड़ दिया, लेकिन उनकी यादें और इतिहास आज भी पाकिस्तान के नक्शे में अंकित हैं।
(अनुष्का चोपड़ा)